यीशु मसीह का जन्म की 6 महत्वपूर्ण बातें | bible vachan

यीशु मसीह का जन्म के कुछ महत्वपूर्ण बातों को अवश्य सभी लोगों को जानना चाहिए। जब भी लोगों के बीच में किसी संसारिक योजना का उद्घाटन होता है, तो अक्सर लोग उसके बारे में जानने के लिए बेताब रहते हैं। परंतु यीशु मसीह का जन्म कोई सांसारिक विषय नहीं था, बल्कि यह सृष्टिकर्ता पिता परमेश्वर की ओर से एक स्वर्गीय योजना था। इसलिए इसके बारे में सभी लोगों को जानना चाहिए।

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यीशु मसीह का जन्म के लिए स्वर्ग से मरियम का चयन

देखिए, यीशु मसीह का जन्म के लिए परमेश्वर की अद्भुत योजनाओं का रूपरेखा स्वर्ग में ही तैयार हो चुका था। क्योंकि इस योजना को पूरा करने के लिए, ( लूका 1:26-38 ) की वचन के अनुसार परमेश्वर का संदेश को लेकर जिब्राइल स्वर्गदूत, कुंवारी मरियम के पास जाते हैं। ऐसा नहीं है, की उस समय परमेश्वर को, मरियम के अलावा संसार में और कोई दूसरी कुंवारी लड़की नहीं मिली? पर बहुत बड़ी सवाल यह है, कि इतने सारे कुंवारी लड़कियां होने के वाबजूद भी, आखिर क्यों परमेश्वर ने मरियम को ही चुना था?

इस सवाल का आसान सा जवाब यह है, कि कुंअरि मरियम पवित्र जीवन जी रही थी। वह निष्कलंक थी, उसने अपने जीवन में कोई भी पाप नहीं की थी। अर्थात कुंवारी मरियम पवित्र थी। क्योंकि यह तो सबको पता है, कि परमेश्वर अपवित्र जीवन जीने वाले लोगों से दूर रहता है। इसलिए परमेश्वर ने यीशु मसीह का जन्म के लिए मरियम का चयन किया था।

आज के समय की बात की जाए तो, लोग दिन ब दिन पवित्र जीवन जीने से कोसों दूर भाग रहे हैं। क्योंकि आज लोग शादी से पहले अनैतिक संबंध बना लेते हैं, और भ्रूण हत्या भी करते रहते हैं। शादी से पहले मियां बीवी की तरह भी इकठ्ठा रहते हैं, और परमेश्वर की दृष्टि में अपवित्र जीवन जीते हैं। जरा सोचिए, आप लड़का लड़की, औरत मर्द, कुंवारा, कुंवारी या कोई भी क्यों न हो, यदि आपके दैनिक जीवन और चाल चलन स्वर्गीय पिता परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अच्छा नहीं है, तो वैसा जीवन पर लानत है।

क्योंकि परमेश्वर को अपवित्र जीवन जीने वाले लोगों से सख्त नफरत है। वे मूर्ख हैं, जो लोग पवित्र जीवन जीने के बजाय पापमय जीवन को चुनते हैं। क्योंकि मनुष्य के लिए, जमीन आसमान और सारे कायनात में ऐसा कोई भी जगह नहीं है, जो परमेश्वर की दृष्टि से छिप कर पाप किया जा सकता हो। अर्थात हम मनुष्य चाहे वह घर के अंदर रहें या जमीन के अंदर, पानी के अंदर रहें या आसमान में उड़ते रहें, फिर भी परमेश्वर की दृष्टि वहां तक पहुंचती है। इसलिए उस वक्त संसार में बहुत सारे कुंवारी लड़कियां होने के वाबजूद भी परमेश्वर की दृष्टि में सिर्फ मरियम ही पवित्र पाई गई थी।

तो दोस्तो, मेरा आपसे एक सवाल है, कि आप कैसी जीवन जी रहे हैं? इसका जवाब कमेंट में जरुर दिजिएगा। क्योंकि प्रभु यीशु मसीह का जन्म से पहले, लोगों के पास पाप से बचने का कोई विकल्प नहीं था। क्योंकि उस समय आज्ञा मानने के द्वारा लोग धर्मी ठहराए जाते थे, और आज्ञाओं को अमान्य करने से पाप होता था, और पाप के कारण दंड से बचना मुश्किल हो जाता था। पर यीशु मसीह का जन्म के बाद पाप से उद्धार पाने के लिए, आपके पास यीशु मसीह के तौर पर एक विकल्प जरुर मौजूद हैं।

यह बात आप पर निर्भर करता है, कि आप किसे चुनते हैं, स्वर्ग का फल जो स्वयं यीशु मसीह तथा उसकी शिक्षा और आज्ञाएं है। नरक का फल, जो पाप गुनाह, अंग प्रदर्शन, हत्या, व्यभिचार, दुष्कर्म, चोरी, लालच, अनैतिक संबंध, अन्याय, अत्याचार, नशापान, लड़ाई झगडे इत्यादि इत्यादि बहुत से बुराईयां मौजूद है। देखिए, एदन की वाटिका में सबकुछ रहते हुए भी, आदम और हव्वा ने जीवन के वृक्ष का फल को छोड़कर मृत्यु के वृक्ष का फल खाया था। पर आप दोबारा ऐसा गलती कभी न करना।

यीशु मसीह के जन्म के समय पहली जनगणना का आरंभ

यीशु मसीह का जन्म के साथ पहली जनगणना का शुरुआत होना यह दर्शाता है, कि इस पृथ्वी पर नएं नियम का आगाज हो चुका था। अर्थात सृष्टिकर्ता पिता परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह का जन्म के साथ साथ इस पृथ्वी के लोगों के लिए, अपनी अपनी पाप और पुराने स्वभावों को छोड़कर नई शिक्षा और आज्ञाओं के अनुसार चलने की सिख मिलती है।

बाइबल के अनुसार जनगणना की बात को देखा जाए तो, ( लूका 2:1-5 ) की वचन के अनुसार उन दिनों में औगूस्तुस कैसर की ओर से, सारे जगत के लोगों के नाम लिखे जाने की, आज्ञा निकाली गई थी। यह उस समय की पहिली नाम लिखाई, और जन गणना थी।

जब सूरिया का हाकिम यानी राज्यपाल क्विरिनियुस था। और उस समय जो लोग जहां भी थे, अपने नाम लिखवाने के लिये अपने अपने नगर को चले गए। सो यूसुफ भी इसलिये कि वह दाऊद के घराने और वंश का था, गलील के नासरत नगर से यहूदिया में दाऊद के नगर बैतलहम को गया। साथ में वह अपनी गर्भवती मंगेतर मरियम को भी ले कर नाम लिखवाने के लिए गए थे।

गोशाला में यीशु मसीह का जन्म

यहां पर समझने वाली बात यह है, कि परमेश्वर के पास कोई या किसी भी चीजों की कमी नहीं है। फिर भी यीशु मसीह को अपने जन्म के लिए गोशाला का चुनाव करना यह दर्शाता है, कि परमेश्वर मनुष्य को बहुत प्रेम करते हैं । इसलिए वह अपने लोगों के लिए दीनहीन बन कर गोशाला में जन्म लिये थे। यीशु मसीह के पास सबकुछ होते हुए भी, ऐसे जन्म लिये थे, जैसे कि उनके पास कुछ भी नहीं है। क्योंकि वह सेवा पाना नहीं, बल्कि सेवा करने और लोगों के उद्धार के लिए अपना जीवन देने के लिए आए थे।

यीशु मसीह का जन्म
यीशु मसीह का जन्म

क्योंकि ( मत्ती 20:28 ) और ( मरकुस 10:45 ) की वचन में प्रभु यीशु इस प्रकार कहते हैं, कि वह इसलिए नहीं आए की उनकी सेवा टहल की जाए, बल्कि वह आप ही दूसरों की सेवा करें और बहुतोंके छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे।

और प्रभु यीशु मसीह का यह वचन सत्य साबित हुई है। क्योंकि जैसे उसने दीनहीन बन कर गोशाला में जन्म लिये थे, वैसे ही असंभव को संभव करने की सामर्थ रहते हुए भी दीनहीन बन कर अपना प्राण क्रुस में दे दिये थे।

देखिए, उस समय औगूस्तुस कैसर की राजाज्ञा के अनुसार जब यूसुफ और मरियम यहूदिया के बैतलेहेम में पहुंचे, तो उन लोगों को वहां पर रहने के लिए कोई भी घर नहीं मिली। क्योंकि चारों तरफ से लोग नाम लिखवाने के लिए वहां पर आए थे। चुंकि उस समय मरियम का बच्चे को जन्म देने की समय पूरा हो चुकी थी। इसलिए आखिरकार उन्होंने, थक हार कर गोशाला में जा कर रह गए, और वहीं यीशु मसीह का जन्म हुआ था। इस प्रकार आपका, मेरा और सारी सृष्टि के मसीहा का जन्म एक गोशाला में हुआ था।

(लूका 2:6-7 ) की वचन के अनुसार बालक यीशु को जन्म के बाद कपड़े में लपेटकर कर माता मरियम चरनी में रखती है। आप थोड़ा सोच सकते हैं, कि अंधेरी रात और कड़क ठंड के समय में, माता मरियम को कितना मुश्किल और परेशानी का सामना करना पड़ा होगा। परन्तु एक मां अपने बच्चे के लिए सब प्रकार के दुख को भी सह लेती है।

चारवाहों को स्वर्ग दूत का सुसमाचार और यीशु का दर्शन

परमेश्वर अपने पुत्र यीशु मसीह का जन्म के द्वारा, संसार को यह स्पष्ट कर देना चाहते थे, कि दीन दरिद्र, समाज से उपेक्षित, अवहेलित और नीच माने जाने वाले लोगों के, दुख दूर करने वाले हैं। सब जानते हैं, कि संसार में दीन दरिद्र और अवहेलित लोगों को सम्मान नहीं मिलता है। परन्तु परमेश्वर के दरवार में ऊंच नीच, धनी दरिद्र और सभी जातियों का स्थान बराबर है। इसलिए प्रभु यीशु मसीह ने दीन दरिद्र और अवहेलित, तथा छोटे माने जाने वाले चरवाहों को सम्मान देने के लिए, अपनी पहली दर्शन दिए थे।

बाइबल बताती है कि, सबसे पहले गड़ेरियों ने प्रभु यीशु का दर्शन किया था। क्योंकि ( लूका 2:8-20 ) की वचन में इस प्रकार लिखा है, और उस देश में कितने गड़ेरिये थे, जो रात को मैदान में रहकर अपने झुण्ड का पहरा देते थे। और प्रभु का एक दूत उन के पास आ खड़ा हुआ; और प्रभु का तेज उन के चारों ओर चमका, और वे बहुत डर गए। तब स्वर्गदूत ने उन से कहा, मत डरो; क्योंकि देखो मैं तुम्हें, बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूं, जो सब लोगों के लिये होगा।

कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और यही मसीह प्रभु है। और इसका तुम्हारे लिये यह पता है, कि तुम एक बालक को कपड़े में लिपटा हुआ और चरनी में पड़ा पाओगे। तब एकाएक उस स्वर्गदूत के साथ स्वर्गदूतों का दल परमेश्वर की स्तुति करते हुए और यह कहते दिखाई दिया। कि आकाश में परमेश्वर की महिमा और पृथ्वी पर उन मनुष्यों में जिनसे वह प्रसन्न है, शान्ति हो।

जब स्वर्गदूत उन के पास से स्वर्ग को चले गए, तो गड़ेरियों ने आपस में कहा, आओ, हम बैतलहम जाकर यह बात जो हुई है, और जिसे प्रभु ने हमें बताया है, देखें। और उन्होंने तुरन्त जाकर मरियम और यूसुफ को और, चरनी में उस बालक को पड़ा देखा। इन्हें देखकर उन्होंने वह बात जो इस बालक के विषय में उन से कही गई थी, प्रगट की। और सब सुनने वालों ने उन बातों से जो गड़िरयों ने उन से कहीं आश्चर्य किया। परन्तु मरियम ये सब बातें अपने मन में रखकर सोचती रही। और गड़ेरियों ने जैसा उन से कहा गया था, वैसा ही सब सुनकर और देखकर परमेश्वर की महिमा और स्तुति करते हुए लौट गए।

उस रात को स्वर्गदूत का सुसमाचार सुना और विश्वास करके यीशु मसीह को देखने चले गए थे। परन्तु आज लोगों के पास यीशु मसीह का संदेश, यीशु मसीह का सुसमाचार सुनने का समय नहीं है। भले ही लोग मोबाइल फोन पर फिजूल की वीडियो को देखकर समय बर्बाद कर देंगे, पर सत्य का सुसमाचार यानी प्रभु यीशु का वचन को सुनने के लिए सिर दर्दी महसूस करेंगें।

परन्तु ( मत्ती 13:16-17 ) की वचन में प्रभु यीशु उन लोगों को धन्य कहते हैं, जो लोग वचन की ओर मन लगाते हैं। क्योंकि उसमें इस प्रकार लिखा है, पर धन्य है तुम्हारी आंखें, कि वे देखती हैं; और तुम्हारे कान, कि वे सुनते हैं। क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूं, कि बहुत से भविष्यद्वक्ताओं ने और धमिर्यों ने चाहा कि जो बातें तुम देखते हो, देखें पर न देखीं; और जो बातें तुम सुनते हो, सुनें, पर न सुनीं।

यीशु मसीह का जिस वचन को आज हम बाइबिल में पढ़ और सुन रहे हैं, उस वचन अर्थात प्रभु यीशु को बहुत से भविष्यद्वक्ताओं और धर्मी लोग देखना और सुनना चाहते थे, परन्तु उनको यह सौभाग्य नहीं मिला था। परन्तु हम और आप बहुत ही सौभाग्यशाली हैं, जो कि बिना परिश्रम के प्रभु यीशु के वचन को देख, पढ़ और सुन रहे हैं।

बाइबल को पढ़ना प्रभु को देखना जैसा है। क्योंकि बाइबल में हम और आप प्रभु यीशु मसीह का वचन को देख कर पढ़ते हैं। क्योंकि ( यूहन्ना 1:1 ) कहता है कि आदि में वचन था, वचन परमेश्वर के साथ था और वचन ही परमेश्वर है। इसलिए परमेश्वर का वचन को इनकार करने का मतलब परमेश्वर को इनकार करना होता है।

यीशु मसीह का जन्म
यीशु मसीह का जन्म

तारा और ज्योतिषियों का दर्शन

आज हम लोग जिस सूर्य, चंद्र और तारों को देख रहे हैं, उन सब को परमेश्वर ने बनाया है, और यह बात अच्छी तरह से लोगों को समझना चाहिए की सूर्य, चंद्र और तारागण परमेश्वर की इच्छा और आज्ञाओं के अनुसार, रात दिन परमेश्वर के लिए ही काम करते रहते हैं। यीशु मसीह का जन्म के समय में भी आसमान में एक ऐसा तारा का उदय हुआ था, जो ज्योतिषियों का मार्गदर्शन करते हुए, उनको प्रभु यीशु मसीह का जन्म स्थान बेथलेहेम तक ले गया था।

( मत्ती 2:1-2 ) की वचन यह कहता है, कि यह घटना यहूदिया के राजा हेरोदेस के समय में हुआ था, और कोई ज्योतिषि वहां आ कर यह पूछा कि यहूदियों के राजा का जन्म हुआ वह कहां है, क्योंकि हमने उसका एक तारा देखा है, और हम उसे प्रणाम करने आए हैं। ( मत्ती 2:9 ) की वचन के अनुसार हेरोदेस के दरवार से जाने के बाद ज्योतिषियों को फिर से तारा दिखाई देता है, और वह तारा उनके आगे आगे चलकर जहां बालक यीशु थे वहीं पर ठहर गया।

ज्योतिषियों को तारा का मार्गदर्शन करना यह दर्शाता है, कि हम सभी मनुष्य के जीवन में भी, उन ज्योतिषियों की तरह सत्य की राह पर चलने की मार्गदर्शन मिलता है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि, जब तक ज्योतिषी लोग प्रभु के दिखाए हुए मार्ग के अनुसार, प्रभु यीशु की दर्शन के खोजी बनकर चलते रहे, तब तक उन्हें तारा दिखाई देता रहा। परंतु जैसे ही वे मार्ग से भटक कर हेरोदेस राजा के दरबार की ओर चलने लगे, तब उन्हें तारा दिखाई देना बंद हो गया, अर्थात परमेश्वर का मार्गदर्शन उनको नहीं मिला।

परन्तु जैसे ही वे हेरोदेस के दरबार से निकल गए, वैसे ही पुनः उनको, उनके मार्गदर्शन के लिए आसमान में तारा दिखाई देने लगा। इसी प्रकार का घटनाएं, हम सभी मनुष्य के जीवन में भी घटते रहता है। जब तक लोग परमेश्वर की शिक्षा, आज्ञा और नियमों के अनुसार चलते रहते हैं, तब तक उनके जीवन में सुख शांति, आशीष और वरदान मिलते रहता है। परंतु जैसे ही लोग पाप गुनाह, अधर्म और अन्याय के मार्ग को अपनाते हैं, वैसे ही उनके जीवन से सुख शांति, आशीष और वरदान चली जाती है। फिर संकट, समस्या, बीमारी और विभिन्न प्रकार के आपदाएं लोगों को परेशान करते रहता है।

राजा हेरोदेस की बच्चों को हत्या का आदेश

दोस्तों, एक महत्वपूर्ण बात यह है, की उच्च पद पदवी पर बैठने वाले लोग समय-समय पर कुछ ऐसी अनैतिक कार्य कर बैठते हैं, जिसका परिणाम आम जनता और निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ता है। राजा हेरोदेस भी सत्ता के लालच में आकर कुछ ऐसी अनैतिक कार्य कर बैठा था, जिसका परिणाम 2 वर्ष या उससे कम के उम्र वाले, सभी निर्दोष बच्चों को अपनी जीवन दे कर भुगतना पड़ा था। क्योंकि ज्योतिषियों की इस बात से हेरोदेस अत्यंत घबरा गया था, कि यहूदियों का राजा का जन्म हुआ है, और हम उसे प्रणाम करने आए हैं, वह कहां है? क्योंकि हेरोदेस को अपनी गद्दी चले जाने की डर सता रहा था।

समझने वाली बात यह है, कि प्रभु यीशु को ज्योतिषियों संसारिक राजा समझ कर हेरोदेस के महल में ढूंढने गये थे, पर वह उन्हें वहां नहीं मिला। क्योंकि यीशु मसीह सिर्फ संसार के ही नहीं, बल्कि सारे कायनात का महाराज और मसीहा हैं। ( मत्ती 2:4-5, 7, 8, 12, 16 18 ) की वचन यह कहता है, कि इसलिए हेरोदेस ने सबसे पहले लोगों के सब महायाजकों और शास्त्रियों को इकट्ठे करके उन से पूछा, कि मसीह का जन्म कहाँ होना चाहिए?

उन्होंने उस से कहा, यहूदिया के बेतलेहेम में। फिर राजा हेरोदेस ज्योतिषियों को चुपके से बुलाकर पूछा कि तारा कब और किस समय दिखाई दिया था। फिर उसने यह कह कर भेजा कि जा कर उस बालक के बारे में ठीक ठीक जानकारी ले कर मुझे इसका समाचार दो, ताकि मैं भी आ कर उसको प्रणाम करूं। पर ज्योतिषियों ने प्रभु की ओर से, स्वप्न में यह चितौनी पाकर कि हेरोदेस के पास फिर न जाना, वे दूसरे मार्ग से होकर अपने देश को चले गए।

जब हेरोदेस ने यह देखा, कि ज्योतिषियों ने मेरे साथ ठट्ठा किया है, तब वह क्रोध से भर गया; और लोगों को भेजकर ज्योतिषियों से ठीक ठीक पूछे हुए समय के अनुसार, बेतलेहेम और उसके आस पास के सब लड़कों को, जो दो वर्ष के वा उस से छोटे थे, मरवा डाला।

आपके विश्वास को पुख्ता करने के लिए मैं यह कहना चाहता हूं, कि इस घटना के घटनेके बहुत सालों के पहले से ही, यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था, वह वचन पूरा होता है। कि रामाह में एक करूण-नाद सुनाई दिया, रोना और बड़ा विलाप, राहेल अपने बालकों के लिये रो रही थी, और शान्त होना न चाहती थी, क्योंकि वे अब जीवित नहीं हैं।

फिर ( यिर्मयाह 31:15 ) की वचन में “यहोवा यह भी कहता है: सुन, रामा नगर में विलाप और बिलक बिलककर रोने का शब्द सुनने में आता है। राहेल अपने लड़कों के लिये रो रही है; और अपने लड़कों के कारण शान्त नहीं होती है, क्योंकि वे जीवित नहीं थे।” इस दुखद घटना घटने के पहले से ही, परमेश्वर ने इसकी जानकारी अपने नबियों के द्वारा लोगों दे दी थी।

क्योंकि परमेश्वर सारी सृष्टि के अधिपति हैं, तथा वर्तमान और भविष्य के बारे में सबकुछ जानते हैं। एक बात यहां पर यह भी देखा जाता है, कि इस्राएली बच्चों के मां के रूप में राहेल का जिक्र किया गया है। क्योंकि राहेल याकूब की पत्नी थी। इसलिए वह सभी इस्राएलियों के माता के तौर पर जानीं जाती है। परन्तु परमेश्वर ने अपने पुत्र यीशु मसीह को राजा हेरोदेस के हत्या वाली षड्यंत्र से बचा लेते हैं। क्योंकि स्वर्गदूत यूसुफ को स्वप्न में दर्शन देकर माता मरियम और बालक यीशु को लेकर मिस्र को चला जाने को कहते हैं।

निष्कर्ष

दोस्तों, इस संसार के लिए यीशु मसीह का जन्म तो एक मसीहा के रूप में हुआ था। पर एक सवाल यह है, कि मेरा, आपका और सारे संसार के लोगों का जन्म, क्या बिना किसी मकसद के हुआ है? जी नहीं मेरे दोस्तों! क्योंकि सबका जन्म अच्छे और सच्चे कर्म करने तथा परमेश्वर की बनाई हुई सृष्टि के कार्य की सन्तुलन को बनाए रखने के लिए हुआ है।

परन्तु ध्यान रखने योग्य बात यह है, कि पाप नहीं करना चाहिए। क्योंकि पाप परमेश्वर की कार्य और योग्यता को बिगाड़ती है। पर दोस्तों, अंत में और एक बात कहना चाहता हूं, कि यदि आपको वचन अच्छा लगे तो कमेंट जरुर किजिएगा। शांति का परमेश्वर आपके जीवन के हर संकट और अभावों को दूर करता रहे। धन्यवाद।

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