यीशु की प्रार्थना और वचन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी

यीशु की प्रार्थना के बारे में आज हम कुछ महत्वपूर्ण बातें करने वाले हैं। जैसा गुरु वैसा चेला का यह कहावत तो आप लोगों ने जरुर सुना ही होगा। क्योंकि यदि गुरु अच्छा हो तो चेलों को भी अच्छी शिक्षा प्राप्त करने में कोई दिक्कत नहीं हो सकती है। परंतु यदि गुरु अच्छा न हो तो चेलों को भी रास्ते से भटकने में देर नहीं लगती है।

यदि आप अच्छा गुरु, अच्छे सेवक और सबका चहेता प्रधान बनना चाहते हैं, तो अवश्य इस लेख को पढ़ने की कष्ट कीजिएगा। मैं यह उम्मीद करता हूं कि इसे पढ़ने के बाद भविष्य में नई ऊंचाइयां छूने से आपको देर नहीं लगेंगी। तो चलिए आज हम इसे, प्रभु यीशु के वचन के द्वारा विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं।

प्रार्थना कैसे करें

पाप क्षमा के लिए प्रार्थना

प्रभु की प्रार्थना

प्रभु यीशु की प्रार्थना का शिक्षा मनुष्यों को नई दिशा प्रदान करता है

परमेश्वर के प्रियजनों यहां पर मैं प्रभु यीशु की प्रार्थना कैसे करनी चाहिए यह नहीं बताने वाला हूं। क्योंकि इसके बारे में मैं बहुत बार बता चुका हूं। पर प्रभु यीशु की प्रार्थना करने की महान शिक्षा के बारे में जरूर बताऊंगा। देखिए जब भी कोई व्यक्ति अकेले रहता है, तो उसे अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर से बातें अवश्य करना चाहिए, जिसे आप प्रार्थना भी कहते हैं। पर आज हम अपने अकेलापन को दूर करने के लिए मोबाइल फोन के जरिए से, यूट्यूब, फेसबुक और तरह-तरह के ऑनलाइन चिजों का इस्तेमाल करते हैं। जोकि आत्मिक जीवन के ऊपर बेहद ही नकारात्मक प्रभाव डालने में कामयाब होती है।

फिर मनुष्य के जीवन में हर तरह के नकारात्मक ऊर्जाओं का प्रभाव को कम करने के लिए, सृष्टि कर्ता परमेश्वर को प्रार्थना करने की अत्यंत आवश्यकता है। आप लोगों ने बाइबल वचन में पढ़ा ही होगा कि प्रभु यीशु हर बड़े काम करने से पहले परमेश्वर पिता से बातें यानी प्रार्थना किया करते थे। इस तरह प्रभु यीशु की प्रार्थना करने का शिक्षा और संदेश मुझको आपको और सारी सृष्टि के लोगों को वह देना चाहते थे।

इसका मतलब साफ है कि हम मनुष्य को हर तरह की परिस्थितियों से मुकाबला तथा अपने मनोबल को सुदृढ़ करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करने की जरूरत है। देखिए मत्ती 14:23-27 की वचन में प्रभु यीशु चेलों को झील के उस पार जाने के लिए कह कर खुद प्रार्थना करने के लिए अकेले पहाड़ी पर चले गए थे।

पर चेलों को यह नहीं पता था कि प्रभु यीशु किस तरह झील के उस पार जाएंगे। क्योंकि प्रभु यीशु का मकसद ही कुछ अलग करने का था। प्रभु यीशु पानी पर चलते हुए अपने अलौकिक शक्ति का सामर्थ चेलों को दिखाना चाहते थे। फिर यह होता है कि विपरीत हवा की वजह से चेलों को नाव चलाने में तकलीफ हो रही थी और उन्हें उस पार जाने में विलंब हो रही थी।

परंतु प्रभु यीशु पानी के उपर पैदल चल चल कर ही उनके पास पहुंच जाते हैं। यदि आप एक मनुष्य की तरह सोचेंगे तो यह सवाल जरूर मन में उठेगा कि विपरीत हवा और लहरों की वजह से जब चेलों को नाव चलाने में परेशानी हो रही थी, तो प्रभु यीशु किस प्रकार लहरों के बीच पानी पर चलते हुए, आगे जाते हैं?

खैर छोड़िए की एक मनुष्य के लिए सब कुछ असंभव हो सकता है। पर परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। परन्तु एक बात यह भी समझने की जरूरत है कि मनुष्य को परमेश्वर ने प्रार्थना करने की शक्ति दी है। क्योंकि प्रभु यीशु की प्रार्थना करने की शैली यह गवाह देती है की मनुष्य को कहीं जाने से पहले, कोई भी काम करने से पहले, उठने बैठने, खाने-पीने या कुछ भी करने से पहले प्रार्थना करने की जरूरत है।

वरना जिस तरह चेलों ने नाव से झील के उस पार जाते हुए विपरीत हवा और लहरों के बीच रात भर फस गए थे, उसी तरह आप लोग भी दुनिया की समस्या, संकट, बीमारी और बेचैनी की जाल में फंस सकते हैं । यदि आप संसारिक बन्धन और शैतान की जाल से बचना चाहते हैं, तो आपको प्रार्थना करते रहना पड़ेगा। क्योंकि मत्ती 26:41 की वचन के अनुसार यदि मनुष्य को संकट, बिमारी, शैतान की परिक्षा और तरह तरह की बुराई के फंदे से बचने के लिए चौकस रह कर प्रभु यीशु की प्रार्थना करते रहना चाहिए।

अर्थात प्रभु यीशु की प्रार्थना ही मनुष्य को हर तरह की परिस्थितियों से बचाने में कामयाब हो सकता है। इसलिए समय निकालकर प्रभु यीशु की प्रार्थना करते रहना चाहिए। लोगों को मोबाइल देखने के लिए बहुत ही आनंद और पर्याप्त समय मिलता है। पर प्रभु यीशु की प्रार्थना में समय देना, बाइबल के वचन को पढ़ना और आत्मिक विषय पर मनन चिंतन करने के लिए बहुत ही कष्ट अनुभव होता है। परन्तु प्रभु के प्रिय जनों यदि आप यीशु को सच में अपना प्रभु और गुरु मानते हैं, तो उनकी शिक्षाओं को भी ग्रहण करने की जरूरत है।

यीशु की प्रार्थना
यीशु की प्रार्थना

यीशु की शिक्षाओं में मानव जाति का कल्याण निहित है

देखिए प्रभु यीशु की प्रार्थना कि शिक्षा के साथ मैं और एक बात बता देना चाहता हूं, कि जैसे प्रभु यीशु अपनी प्रार्थना की शिक्षा के द्वारा लोगों का शारीरिक और मानसिक संतुलन का ध्यान रखते थे। वैसे ही अपनी जीवनदाई वचन के द्वारा लोगों का स्वार्थ और घमंड को भी दूर करने की अपना जीता जागता उदाहरण शिक्षा के द्वारा दिए थे।

देखिए मत्ती 17:24-27 वचन के अंदर प्रभु यीशु के चेलों में से एक पतरस को जब मन्दिर के कर लेने वालों ने यह पूछा कि क्या तुम्हारे गुरु कर देते हैं? पतरस इसका जवाब हां में देता है। फिर वहां पर ऐसा होता है, कि जब पतरस प्रभु यीशु के यहां जब घर को लौटता है, तो पतरस के कुछ कहने से पहले ही प्रभु यीशु यह पूछते हैं कि दुनिया के राजा कर किससे लेते हैं?

अपने बेटे से या बाहर वालों से! आपकी जानकारी के लिए और आपकी विश्वास को और मजबूत करने के लिए, मैं आपको यह बता देना चाहता हूं, कि पतरस और कर लेने वालों से जब येरूसालेम मन्दिर में, लेने देने के बारे में बातचीत हो रही थी, तो वहां पर प्रभु यीशु नहीं थे।

फिर भी उस बात की जानकारी प्रभु यीशु को कैसे हुई? इसका जवाब यह है कि वह सचमुच प्रभु है। यदि वह मनुष्य ही होते तो दूसरे लोगों की बातों को प्रकट नहीं कर पाते। क्योंकि मनुष्य किसी विषय की जानकारी रखने के लिए बार बार पढ़ने के वाबजूद भी याद नहीं रख पाता, तो दूसरे लोगों की बातों को प्रकट करना असंभव ही नहीं बल्कि नामुमकिन भी है।

प्रभु के प्रिय जनों क्या आप कुछ समझ पा रहे हैं, या अभी भी नासमझ की तरह पढ़ रहे हैं। मेरा कहने का मतलब यीशु प्रभु होकर भी आपको, मुझ को और दुनिया के सारे लोगों को गलत उदाहरण या गलत शिक्षा देना नहीं चाहते थे। इसलिए प्रभु यीशु पतरस से यह सवाल पूछे थे कि दुनिया के राजा कर अपने बेटे से या दूसरे से लेते हैं? उसने प्रभु अर्थात सबसे बड़े होकर भी दूसरों के लिए ठोकर या फंदे का कारण नहीं बना। क्योंकि वह यह चाहते हैं, कि हम सब मनुष्य भी उसकी शिक्षा का बखूबी से पालन करें।

आजकल आप लोगों ने देखा ही होगा की बड़े और ऊंचे पद वाले लोग, अपने से छोटे पद और साधारण लोगों से भरपूर सेवा करवाते रहते हैं। पर आप लोगों उनके जैसा नहीं बनना है, जैसे कि जो लोग प्रभु यीशु को नहीं जानते हैं। परन्तु आपको प्रभु यीशु की शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए, दूसरों को अपनी बातचीत, चालचलन और स्वभाव से अच्छी नमुना का परिचय देते रहें। क्योंकि परमेश्वर को यह अच्छा लगता है। फिर यदि आप प्रभु यीशु की आज्ञा और शिक्षाओं समझदारी के साथ पालन करते हैं, तो आप सच में प्रभु के चेले हैं।

निष्कर्ष

प्रभु के प्रिय जनों प्रभु यीशु के हर शिक्षा में जीवन और जान है। यदि मनुष्य गलत शिक्षा और बुरी संगति का अनुयाई बन जाए तो मैं शत प्रतिशत दावा करता हूं, कि उसकी पतन होने में देर नहीं लगेगी। मैं चाहता हूं कि प्रभु यीशु की प्रार्थना और उसकी हर तरह की शिक्षाओं को एक बार अपने दिलो-दिमाग में बसा लिजिए और देखिए आप पूरी तरह से नईं सृष्टि के मनुष्य बन जाएंगे।

क्योंकि प्रभु यीशु का वचन, आप, मैं और दुनिया में बसने वाले सारे लोगों की तरह आम इंसान का वचन या बात नहीं है। बल्कि इब्रानियों 4:12 की वचन के अनुसार परमेश्वर का वचन जीवित, प्रबल और हर दोधारी तलवार से भी ज्यादा चोखा है। क्योंकि परमेश्वर का वचन मनुष्य का हर परिस्थितियों में, हर प्रकार के विचारों में शरीर या मन के आर पार को छेद सकता है।

इसका मतलब परमेश्वर का वचन को जल, जमीन और आसमान में रहने वाले कोई भी दृश्य या अदृश्य, इन्सान हो या शैतान कभी भी कैद नहीं कर सकता है। क्योंकि यूहन्ना 1:1 में लिखा है कि वचन ही परमेश्वर है। प्रभु के प्रिय जनों इस वचन आपके आत्मिक जीवन में अच्छा फल लाने में सक्षम हो और दुनिया के उतार-चढ़ाव भरा जिंदगी में प्रभु यीशु का वचन आपका साथ देते रहे। यदि वचन अच्छा लगे तो लाइक कमेंट और शेयर करना कभी न भूलिएगा। आपके जीवन में प्रभु की आशीष का बारिश होती रहे। धन्यवाद।। Praise the lord.

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