मित्रता किससे करना चाहिए?: Man or God 2021

मित्रता मनुष्य के जीवन में अहम भूमिका अदा करती है। प्रेम का दूसरा नाम मित्रता है। चाहे वह लड़का, लड़की, पति पत्नी, माता-पिता के साथ बच्चों का प्रेम या किसी भी प्रकार की कपट रहित प्रेम को सच्ची मित्रता का नाम दे सकते हैं। मित्रता का परिभाषा ही प्रेम है यह तो सबको ज्ञात है, परन्तु आज आप इस लेख को पढ़ने के पश्चात उनसे मित्रता करना प्रारंभ कर देंगे, जिसकी आपको कल्पना भी नहीं होगी। अगर आप जानना चाहते हैं; तो इस लेख को पढ़ने की जरूर कष्ट करें।

लोगों को मित्रता किससे करना चाहिए?

जब मैं बच्चा था, तो बच्चों की तरह ही दूसरे बच्चों को भी मित्र बनाता था। फिर जब मैं सियाना हो गया तो बड़ों की तरह मित्रता करने लगा। पर मुझे यह समझ में नहीं था की मित्र के मन में भी कपट, ईर्ष्या, मन में ठेस या धोखा लगने वाली बात हो सकती है। दूसरे मित्र जब मुझसे इस तरीके से व्यवहार करते थे तो मुझे भी दुःख पहुंचता था। क्योंकि मैं जिस तरह दूसरों से सच्ची मित्रता निभाता था, वैसा ही मैं भी चाहता था कि वे भी मेरे सच्चे मित्र बने, पर इसका विपरीत हो जाता था।

  • परन्तु यदि आप सच्चे मित्र बन कर जैसे दूसरों का सहयोग या उपकार कर रहे हैं; इसका अर्थ यह नहीं कि वे भी आपके लिए ऐसा ही करें। पर अगर इस प्रकार आपके मन में चाहत रहती है, तो समझिए कि आपकी मित्र बनने में भी स्वार्थ लाभ की आशा है। मेरा भी इस प्रकार का चिंताधारा था, और मुझे ही दुःख मिलता था। फिर मैं लोगों से मित्रता करना छोड़ दिया। इसका अर्थ यह नहीं कि मैं लोगों के साथ रहना और मिलना छोड़ दिया। क्योंकि मैं अब अपनी बात (मत्ती 5:37) के अनुसार, बगैर जोर डाले हां कि हां और नहीं कि नहीं के अनुसार चलता हूं।
  • क्योंकि अब मैं लोगों से मित्रता नहीं बल्कि प्रभु यीशु से मित्रता की है। क्योंकि (यूहन्ना 15:15) कि वचन के अनुसार वह हमें मित्र कहते हैं। वह सच्चा मित्र है, उसका प्रमाण उसने अपने प्राण को हमारे पापों के लिए बलिदान देकर दिया है। इसलिए मनुष्य की मित्र बनने से अच्छा प्रभु की मित्र बनना मेरे लिए अधिक सुखद अनुभूति है। क्योंकि मनुष्य तो अपने स्वार्थ के लिए लोगो को मित्र बनाते हैं, परन्तु प्रभु यीशु हमारी सच्चे मन को चाहते हैं। उनका केबल मनुष्य से एक ही आशा रहता है, कि वे पाप रहित जीवन बिताएं।
  • फिर किसी ने मुझे यह सवाल किया, कि जब तुम मनुष्य से मित्रता नहीं कर रहे हो तो कौन तुम्हारा सुख दुख में साथ देगा? मैंने उससे कहा भाई साहब बहुत बढ़िया सवाल किए हैं? परंतु यह बात भी जान लेना आवश्यक है, कि अगर लोग आपके साथ हजार हैं, पर जब प्रभु ही आपके साथ न हो तो क्या आपको कोई बीमारी या संकट अथवा मृत्यु से कौन बचा सकता है? मैं यह नहीं कहता कि आप किसी को मित्र न बनाएं? परंतु जब भी आप किसी को मित्र बनाते हैं, तो उससे भी सावधान रहना चाहिए।
मित्रता किससे करना चाहिए?

मित्रता का परिभाषा क्या है?

सच्ची मित्रता वह होती है, जिसमें कपट, ईर्ष्या, कष्ट पहुंचाना, मौका का लाभ उठाना, प्रताड़ना करना और धोखा देने वाली बात नहीं रहती है। पर आजकल के समय में सच्चे मित्र मिलना असंभव है। क्योंकि आजकल के लोग अपने लाभ के निमित्त दूसरे से मित्रता करते हैं। इसलिए अपने मित्र से भी सावधान रहना चाहिए। क्योंकि (मीका 7:5) का वचन कहता है, अपने मित्र पर विश्वास मत करो और अपने परम मित्र पर भी भरोसा न रखो इसके अलावा अपने अर्धांगिनी से भी संभल कर बोलना चाहिए।

इसका जवाब (मीका 7:6) में लिखा है, की पुत्र पिता का अपमान करता है, बेटी माता के और बहू सास के विरुद्ध उठती है, क्योंकि मनुष्य का शत्रु उसके घर के लोग ही होते हैं। जब एक व्यक्ति का शत्रु अपने घर का ही लोग हैं, तब वह पराए को किस प्रकार परम मित्र बना सकता है। तो आप ही बताइए, कि आपका सच्चा मित्र कौन हो सकता है?

लोग किस प्रकार की मित्रता करते हैं?

कोई-कोई लोग किसी-किसी की सूरत पर मोहित होकर मित्रता करते हैं, कोई-कोई खा पी कर मतवाला होने के लिए और कोई-कोई अपने स्वार्थ लाभ के निमित्त दूसरों से मित्रता करते हैं। सच कहें तो आज के जमाने में, बिना स्वार्थ लाभ के बगैर कोई भी किसी का मित्र नहीं बनता है। परंतु 100 में से 95% लोग ही सच्ची मित्रता निभाते हैं। (नीतिवचन 17:17) कहता है, मित्र सभी समय पर प्रेम रखता है, और विपत्ति के समय में वह भाई बन जाता है। अर्थात सच्चे मित्र के पास कपट रहित और निस्वार्थ भाव प्रेम होना चाहिए।

अक्सर बहुत ही लोगों में यह भी देखा जाता है, कि जब भी किसी को दुसरे मित्रों का साथ न मिलने पर लोग रूठने लगते हैं और उनका मित्र बनना छोड़ देते हैं। इस प्रकार की व्यवहार एक सच्चे मित्र पर शोभा नहीं देती है। जहां आंतरिक सहानुभूति और परोपकार गुण तथा पारस्परिक समझ एवं सहयोग न हो वहां मित्रता ज्यादा दिन तक नहीं टिकता है।

निष्कर्ष

दोस्तों हमें ज्यादा लंबा चौड़ा लिखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि समझदार को इशारा काफी है। पर एक ही बात कहना चाहता हूं, अगर आप किसी का मित्र बनते हैं; तो कपट रहित मित्र बने, सच्चाई से चलें, पापों को त्यागें और हो सके तो उससे भी बढ़कर परमेश्वर का वचन को अपना मित्र बना लें। धन्यवाद।।

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